सिखों के आखिरी राजा, जो ईसाई बने, रूस के ज़ार से भारत पर चढ़ाई के लिए कहा

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Maharaja Ranjit Singh

आखिरी सिख महाराजा दलीप सिंह की कहानी भी अजीब ही है. आज पेरिस में 1893 में उनका निधन हो गया था. उन्होंने पहले ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया. फिर वापस सिख धर्म में लौटे. उन्होंने दो विदेशी महिलाओं को रानी बनाया. वो जार को मनाने के लिए रूस भी गए कि वो ब्रिटिश इंडिया के खिलाफ युद्ध छेड़ दें. हालांकि ऐसा हो नहीं सका. महाराजा पर द ब्लैक प्रिंस के नाम से एक फिल्म भी बनी.

महाराजा दिलीप सिंह लाहौर में 6 सितंबर 1838 के दिन पैदा हुए थे. उनके पिता रणजीत सिंह ताकतवर सिख राजा थे. पंजाब में उनकी सल्तनत फैली हुई थी. ये राजघराना काफी ताकतवर माना जाता था. वो पंजाब के महाराज रणजीत सिंह के सबसे छोटे और महारानी जिंद कौर के अकेले बेटे थे.

पिता के निधन के बाद उनके सौतेले बड़े भाई को महाराजा बनाया गया लेकिन उनके निधन के बाद 05 साल की छोटी उम्र में उन्हें सिख साम्राज्य का शासक बनाया गया. उनके नाम पर उनकी मां जिंद कौर रिजेंट बनकर राजकाज चलाती थीं. लेकिन शासन व्यवस्था अराजक और कमजोर होती जा रही थी. तरह तरह की दिक्कतें पैदा हो रही थीं.

अंग्रेजों से हार के बाद ब्रिटेन भेज दिया गया
इसी अराजकता के बीच 1849 में पहला आंग्ला-सिख युद्ध हुआ. ब्रिटिश राज की जीत हुई और महाराजा को गद्दी से हटा दिया गया. वो सिख साम्राज्य के आखिरी राजा थे.उनकी मां को उनसे अलग करके कोलकाता भेज दिया गया, वहीं दलीप सिंह को पहले फतेहगढ़ भेजा गया और फिर ब्रिटेन भेज दिया गया.

 

महज 05 साल की उम्र में जब दलीप सिंह को पंजाब का महाराजा बना दिया गया. तब उनकी मां ने रिजेंट बनकर कामकाज संभाला.

क्वीन विक्टोरिया के साथ समय गुजारते थे

मई 1854 में कम उम्र में उन्हें इंग्लैंड ले जाया गया. वहां उनकी मुलाकात क्वीन विक्टोरिया से कराई गई. वो महाराजा से स्नेह करने लगीं. महाराजा को अंग्रेज़ीदां तौर-तरीके सिखाए गए. इसका असर उन पर ऐसा पड़ा कि वो खुद ही अपनी भाषा, धर्म और कल्चर से अलग होते गए. वो अंग्रेज़ों की देख-रेख में बड़े हुए. बाद में वहीं धर्म परिवर्तन करके ईसाई बन गए.

कहा जाता है कि क्वीन विक्टोरिया उन्हें अपने सबसे पसंदीदा बेटे की तरह रखती थीं. क्वीन उन्हें “द ब्लैक प्रिंस” कहकर बुलाती थी. जिस भी रॉयल पार्टी में महारानी विक्टोरिया जाया करतीं, वो राजकुमार को भी साथ ले जाती थीं.

अंग्रेजों की तरह रहते थे

करीब 10 साल तक दिलीप सिंह रॉयल परिवार के साथ यूरोप घूमे. वैभव भरी जिंदगी देखी. बिताया. निजी जिंदगी में वो अंग्रेज़ों की तरह रहते. पब्लिक में खुद को इंडियन प्रिंस की तरह प्रेज़ेंट करते.

 

जब महाराजा दलीप सिंह को कम उम्र में रहने के लिए ब्रिटेन भेज दिया गया. वो वहां उनकी परवरिश अंग्रेज तौरतरीकों से हुई. वहां उन्होंने ईसाई धर्म भी स्वीकार कर लिया.

मां से मिलन के बाद आंख खुली
मां से अलग होने की वजह से वो कई बार मां को चिट्ठी भेजते थे और मिलने की बात कहते थे लेकिन ब्रिटिश राज उनकी चिट्ठियों को या तो सेंसर कर देता था या उसे उनकी मां के पास नहीं पहुंचने देता था. ऐसे में उन्होंने खुद ही जाकर मां से मिलने का फैसला किया. मां से अलग होने के 13 साल बाद वो उनसे मिले. तब वो नेपाल में रह रही थीं. दिलीप से मिलवाने के लिए उन्हें कलकत्ता लाया गया था. मां बूढ़ी हो चुकी थी. अंग्रेजों को लगता था कि अब अगर वो मां से मिल भी लेंगे तो कोई खतरा नहीं है.

दोबारा सिख बने

अंग्रेजों को तब तक ये लगता था कि वो अंग्रेज रंग में इतने रंग चुके हैं कि ब्रिटिश राज और क्वीन को ही अपना मानते हैं. जब वो मां से मिले तब उन्हें उनके खोए हुए राज्य की याद दिलाई. इसके दो साल बाद ही महाराज की मां की मौत हो गई. इसके बाद दलीप सिंह अपने राज्य की आजादी के लिए लड़ते रहे. उन्होंने ईसाई धर्म छोड़कर फिर से सिख धर्म अपनाया.

दोनों बीवियां अंग्रेज थीं

दलीप सिंह की पहली पत्नी मिस्र की बांबा मुलर थीं. जो काहिरा में पैदा हुईं थीं. उससे शादी कर ली, जो क़ाहिरा में पैदा हुई थीं. आस्थावान ईसाई थीं.उनके 06 बच्चे हुए. वह एल्वेडन हॉल में रहने लगे, जो ग्रामीण इलाके सफ़क में था.

पहली पत्नी के निधन के बाद उन्होंने अडा डगलस से दूसरी शादी की. इससे दो बच्चे हुए लेकिन उनके किसी भी बच्चे को ब्रिटेन ने कानूनी राजसी दर्जा नहीं दिया. उन्हें ईसाई ही माना गया. इस तरह दलीप सिंह का सिख वंश वहीं खत्म माना जाता है.

कर्ज में डूबते चले गए महाराजा

1870 तक महाराजा आर्थिक दिक़्क़तों में घिर गए थे. ब्रितानी सरकार से मिलने वाली पेंशन पर 06 बच्चों के लालन-पालन और विलासी जीवन बिताने की वजह से वो बुरी तरह कर्ज में डूबते गए. उन्होंने सरकार से भारत में मौजूद अपनी ज़मीन और जायदाद के बारे में पूछना शुरू किया. उन्होंने दावा किया कि पंजाब पर क़ब्ज़ा कपटपूर्ण तरीके से किया गया था.

महाराजा दलीप सिंह का निधन पेरिस के एक होटल में 1893 में हुआ. वहां से उनके शव को ब्रिटेन में लाकर दफना दिया गया. सिख अब इसे भारत लाना चाहते हैं.

भारत आना चाहते थे, अंग्रेजों ने रास्ते में ही रोक लिया

उन्होंने भारत में अपनी जायदाद के लिए हर्जाना मांगते हुए सरकार को तमाम चिट्ठियां लिखीं. इसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ. 31 मार्च, 1886 को दलीप सिंह ने अपनी ज़िंदगी का सबसे साहसिक कदम उठाया. वह अपने परिवार के साथ समुद्र मार्ग से भारत के लिए चल पड़े. ब्रितानियों को बताया कि वो फिर से सिख बन रहे हैं. अपनी ज़मीन पर दावा करेंगे.

ब्रितानी एक और बग़ावत का ख़तरा नहीं उठा सकते थे. जब महाराजा का जहाज़ भारत के रास्ते में पड़ने वाले एडेन में रुका तो महाराजा को हिरासत में लेकर नज़रबंद कर दिया गया. उनका परिवार ब्रिटेन लौट गया. लेकिन दलीप सिंह ने सिख धर्म ग्रहण कर लिया. महाराजा को यूरोप जाने की तो इजाजत थी लेकिन भारत की नहीं.

रूस जाकर ज़ार से मिले लेकिन फायदा नहीं हुआ

इसी दौरान वो रूस भी गए. वहां जार से मिले. उसे ब्रिटिश राज पर आक्रमण के लिए मनाने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी. दलीप सिंह कई साल हताशा में भटकते रहे. अक्तूबर 1893 में अकेलेपन और मुफ़िलिसी में उनकी पेरिस में मौत हो गई.

पेरिस में निधन 

उनका शव ताबूत में रखकर वापस इंग्लैंड के एल्वेडन लाया गया. अंतिम संस्कार ईसाई ढंग से किया गया. उन्हें सेंट एंड्यूज़ एंड सेंट पैट्रिक्स चर्च में दफ़नाया गया. सरकारी वजहों से ब्रितानी सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि उन्हें ईसाई के रूप में दफ़नाया जाए, ताकि उन पर दावा हमेशा बना रहे. लेकिन अब सिख संगठन उनकी कब्र से शव को निकालकर भारत लाना चाहते हैं. इसे लेकर विवाद चल रहा है.

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